Showing posts with label प्रेरक. Show all posts
Showing posts with label प्रेरक. Show all posts

Friday, 31 March 2017

पागल कौन है | Who is mad

pagal kon hai
पागल कौन है | Who is mad

एक बार एक राजा था, उसका भरा-पूरा राज्य था | सारी प्रजा उसके राज में खुश-हाल थी, राजा किसी को कभी कोई समस्या नहीं आने देता था | मगर राज्य में दो कुएं थे, एक कुआ वो, जिसमे से प्रजा पानी ले जाती थी और दूसरा कुआ वो, जिसमे से राजा के लिए पानी ले जाया जाता था |

एक बार एक वैध उस राज्य से होकर गुजर रहा था, उसके पास उसकी जड़ी-बूटियों का झोला भी था | रात के अँधेरे में अचानक वो उस कुए से टकराया, जिससे प्रजा पानी ले जाया करती थी और वहां टकराते ही उसका जड़ी-बूटियों का झोला उसी कुए में गिर गया | अँधेरा होने के कारण वो कुए में देख नहीं पाया और चंद प्रयत्न करने के बाद हार कर अपने रस्ते की और चल दिया |


मगर अब कुछ ऐसा होने वाला था, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था | रात भर जड़ी-बूटियों का कुछ ऐसा मिश्रण बना जिसने पानी को एक प्रकार का रासायनिक द्रव्य बना दिया | सुबह वो पानी पूरी प्रजा तक पहुँच गया और सभी ने उसका सेवन किया |


कुछ वक्त बाद धीरे-धीरे प्रजा के सभी लोग पागल होने लगे, सिवाए राजा के | स्मरण रहे सिवाए राजा के | अब प्रजा के सभी लोग पागलों जैसा व्यवहार करने लगे थे पर राजा सामान्य था | प्रजा के सभी लोग स्वयं पागल थे और असामान्य गतिविधियाँ करते थे और जब भी राजा प्रजा के बीच कोई सामान्य कार्य करता तो पूरी प्रजा राजा को पागल समझती थी |

ध्यान से पढ़िए की पूरी प्रजा राजा को पागल समझती थी जबकि पागल वो स्वयं थे |

अब बात की गंभीरता पर चलते है, की वहां असल में पागल कौन था, प्रजा या राजा ? दोनों पक्ष एक दुसरे को पागल समझ रहे थे, क्या सच में राजा पागल था या प्रजा पागल थी ?


प्रजा की और से देखें तो राजा और राजा की और से देखे तो प्रजा | असल में ये केवल विचारो का फर्क है, आजतक आपने जो भी सभी लोगो को करते देखा है, वो आपके दिमाग में एक विचार बन गया है, और अब अगर आप अचानक किसी ऐसे व्यक्ति,समुदाय या फिर समाधान को देखते है जो आपने आजतक नहीं देखा तो आप उसे पागल कहते है | असल में पागल शब्द को अच्छे से समझा जाये तो अर्थ है की मैं तुम्हारी गतिविधियों, विचारों और काम करने के तरीकों को नहीं समझ पाया हूँ |


पढ़ा-लिखा व्यक्ति किसी अनपढ़ को पागल कहता है, तो अनपढ़ पढ़े-लिखे व्यक्ति को | असल में दोनों केवल आरोप लगा रहे है, मगर दोनों में से कोई एक दुसरे को समझने की कोशिश नहीं कर रहा | अगर दोनों एक दुसरे को समझने की कोशिश करे तो वो जान जायेंगे की पागल कोई नहीं था, असल में वो केवल उनके विचारो में था, जिसका कभी कोई अस्तित्व ही नहीं है |

Thursday, 23 March 2017

सच की नींव | Base of truth

sach ki neev
सच की नींव | Base of truth

एक बार एक राजा के महल में किलकारी गुंजी अर्थात राजा के यहाँ एक लड़का हुआ था । सभी बेहद ही खुश थे, राजा ने भव्य आयोजन रखा था , जहाँ सभी लोग आमंत्रित थे । आमंत्रित लोगो में से राजा के राज घराने के पुरोहित भी शामिल थे, जिन्हें बेहद की ग्यानी माना जाता था । राजा उन्हें बड़े सम्मान से अपने पुत्र के कक्ष में लेकर गए, और पूछा की "हे पुरोहित, मेरे पुत्र को आशीर्वाद दें और बताये की आगे चलकर इसकी किन चीज़ों में रूचि रहेगी" ।

पुरोहित ने शिशु के पाँव देखते ही कहा की "राजन, ये बालक या तो सबसे बड़ा शासक बनेगा या फिर सबसे बड़ा सन्यासी" । राजा शासक के नाम पर तो खुश था , मगर वो अपने पुत्र को सन्यासी बनते नहीं देख सकता था, तो राजा तुरंत पूछ बैठा की "पुरोहित जी, कोई उपाय बताइये, जिससे ये बड़ा होकर सन्यासी ना बनें" ।


पुरोहित ने कहा की इसके दिमाग में सच की नीवं नहीं डलनी चाहिए, राजा के समझ नहीं आया और वो फिर से पूछ बेठा की पुरोहित जी मैं इसका तात्पर्य समझा नहीं | पुरोहित जी बड़ी गहरी बात कह रहे थे, उन्होंने फिर कहा की इस बालक को केवल वही सच बताया जाये जिससे यह शासक बना रहे, इसे वो सच न बताया जाये जो इसे सन्यासी बना दे | राजा समझ गया था की पुरोहित जी किस और इशारा कर रहे है |



समाहरोह खत्म हुआ और राजा ने तुरंत अपने सभी सहकर्मियों, मंत्रियो, सेवकों और अपने सभी परिवार जन को एक सभा के लिए एकत्रित करवाया | सभी चकित थे की राजा ने इतनी शीघ्र सभी को यहाँ एकत्रित क्यों किया है ? तभी राजा सभी से बोल बेठा की "यहाँ मोजूद सभी लोगो को एक बात का ध्यान रखना होगा | मेरा पुत्र अभी किशोर अवस्था में नहीं आया है, वो संसार के अनुभवों से वंचित है मगर जैसे-जैसे वो बड़ा होगा हमें कुछ बातो का ध्यान रखना होगा" |

राजा ने सेवको को आदेश दिए की मेरे पुत्र के सामने कभी झड़े हुए पुष्प नहीं आने चाहिए, बगीचों में जो भी पेड़ पतझड़ का संकेत देने लगे उसे वहां से हटा दिया जाये और बगीचों को हमेशा बिना किसी मुरझाये पेड़ और पुष्पों के रखा जाये | राजा ने फिर से दूसरा आदेश जारी किया की मेरे पुत्र को कभी कोई म्रत्यु की खबर नहीं सुनाई जाएगी और कभी कोई बुजुर्ग उसकी आखो के सामने नहीं जायेगा इसलिए सभी बुजुर्ग लोगो का महल में आना प्रतिबंधित कर दिया गया |


राजा ने वो सभी चीज़े प्रतिबद्ध कर दी जो उसके पुत्र को आघात पंहुचा सके, जो उसके पुत्र को सोचने पर मजबूर कर सके | इसके बाद महल में वही हुआ जैसा राजा ने कहा, मगर ये सब केवल महल तक ही सिमित था | राजा का पुत्र धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था, वो कई बार महल से बहार जाने की जिद भी करता मगर सभी उसे बहला-फुसला कर महल में ही रोक लेते |

मगर एक दिन राजा के पुत्र ने ठान ली को वो बाहर की दुनिया देखना चाहता है और कोई उस वक्त उसे रोक नहीं पाया, क्योकि राजा का पुत्र अब बड़ा हो चूका, था समझदार हो चूका था, तो उसे अनुमति दे दी गई | परन्तु वो नहीं जनता था की आगे उसका किन अनदेखी चीजों से सामना होने वाला है |

मेलें में अपने मित्र के साथ और अपनी बग्गी पर चलते हुए उसे एक बुजुर्ग इंसान दिखाई दिया, वो चोंक गया की संसार में ऐसा भी कोई प्राणी है क्योकि उसने आजतक कभी किसी बुजुर्ग व्यक्ति को देखा ही नहीं था, वो तुरंत अपने मित्र से पूछ बेठा की "ये क्या है ?" मित्र ने कहा "यह एक बुजुर्ग व्यक्ति है", राजा के पुत्र ने फिर पूछा "ये क्या होता है ?", मित्र मुस्कुराने लगा और समझाया की सभी लोग धीरे-धीरे बुजुर्ग हो जाते है ये प्रकर्ति का नियम है | राजा के पुत्र ने फिर सवाल उठाया की "क्या मैं भी बुड्डा हो जाऊंगा ?", मित्र ने कहा "हाँ, तुम भी बुड्डे हो जाओगे |"


यह सुनते ही राजा के पुत्र ने बग्गी रुकवाई और कहने लगा की मुझे शीघ्र घर ले चलो, सभी ने पूछा "क्यों, आप तो भ्रमण करने आये थे, क्या हुआ ?" | मगर राजा के पुत्र का जवाब सुन सभी चकित रह गए, उसने कहा की "मैं अब बुड्डा हो चूका हूँ, मुझे घर जाना है"

बग्गी तुरंत महल की और मोड़ ली गयी मगर रास्ते को कुछ और ही मंजूर था, रास्ते में राजा के पुत्र ने वो सभी दुःख दर्द से भरे लोग देखे जो तकलीफ में थे मगर अंत में आते-आते उसने एक ऐसी चीज़ देखि जिसे देख कर वो स्तब्ध रह गया | वो थी अर्थी, जो एक मरे हुए मनुष्य को ले जा रही थी | उसने फिर अपने मित्र से सवाल किया "ये क्या है ?", मित्र ने कहा "ये अर्थी है, जो मनुष्य के मर जाने के बाद काम आती है", राजा के पुत्र ने फिर सवाल किया की "ये मनुष्य का मरना क्या होता है ?", मित्र ने कहा "एक दिन सभी को मरना है" |


यहीं राजा के रचाए सारे खेल का अंत हो गया, राजा के पुत्र ने बग्गी रुकवा दी | सभी ने पूछा "क्या हुआ ? अब कहाँ जाना है ?", राजा के पुत्र के मुख से शब्द निकले की "अब तो जहाँ ले चलना है ले चलो, मैं तो मर चूका हूँ" |

सभी यह सुनकर स्तभ्द हो उठे क्योकि वो समझ गए थे की वो सच अब सामने आ गया है जो इतने वर्षो से छुपाया जा रहा था | यही है सच की नीवं, अर्थात सच जानते ही उसे अपने विचारो का आधार बना लिया, जो बेहद ही जरुरी है |

आज अधिकतर लोग सच सुनते तो है मगर समझते नहीं है, उसे अपने विचारो की नीवं नहीं बनाते | उनके अपने सामाजिक तोर पर इंसानी दिमाग की उपज के एक अलग ही विचार है, जो अंदर से खोखले है, बिखरे हुए है जो केवल दिखावा करना जानते है, उन्हें सच तक जाना ही नहीं है और यही उनके विचरो के विकास में बाधा डालते है |

राजा का पुत्र कोई और नहीं बल्कि "महात्मा बुद्ध" थे | जिनका असली नाम "सिद्धार्थ गौतम" था | जिन्हें आज पूरी दुनिया मानती है, उनके कहे गए एक-एक शब्द की गहराई समझ कर चकित हो उठती है | यहीं सच की नीवं का असर दीखता है की वो कितनी ताकतवर और बलशाली है |

Monday, 20 March 2017

आधारहीन समाज | Baseless society

aadharheen samaj
आधारहीन समाज | Baseless society


एक बार वैज्ञानिको ने एक प्रयोग किया, एक बड़ा सा पिंजरा तैयार करवाया गया जिसके बीचो-बीच एक लम्बी सी सीडी लगवाई गई, और सीडी के सबसे ऊपरी छोर पर केलों का गुच्छा टांग दिया गया | प्रयोग शुरू करने से पहले ये वो सभी इंतज़ाम थे जो बेहद ही आवश्यक थे |

अब पशुविभाग की अनुमति द्वारा कुछ बंदर लाये गए जिनमे से पांच(5) बंदरो को उस पिंजरे में छोड़ दिया गया | कुछ देर तक पांचो बंदर इधर-उधर घूमते रहें, तभी उनमे से एक बंदर की नज़र सबसे उपर टंगे केलों के गुच्छो पर पड़ी और वो तुरंत उनकी और दोड़ पड़ा, मगर वैज्ञानिको ने कुछ तो सोचा ही था, तभी इतना बड़ा इंतज़ाम किया गया था | वाजिब है वही हुआ, वज्ञानिको ने ठन्डे-ठन्डे पानी की फवार डालने का वहां इंतज़ाम कर रखा था, जैसे ही वो एक बंदर केलों के गुच्छो के समीप पहुचने लगा तभी अचानक ठंडा-ठंडा पानी पूरी रफ़्तार से उस पर छोड़ दिया गया |


बंदर अचानक घबरा गया और अपनी पूरी तेज़ी से नीचे की और दोड़ कर कोने में दुबक गया, मगर ये क्या ? बाकी बंदरो को भी ठन्डे पानी की बोछार झेलनी पड़ी और वो भी दुपके हुए थे | कुछ देर बाद तापमान सामान्य हुआ और फिर से एक बंदर ने हिम्मत दिखा कर केलों के गुच्छो की और कदम भडाये, मगर वही हुआ जो पहले हुआ था | वैज्ञानिको ने फिर से ठन्डे पानी की बोछार उस बंदर पर बरसादी, वो भी पहले वाले बंदर की तरहा नीचे की और दौड़ा और दुबक गया, साथ ही साथ बाकी के चारो(4) बंदरो को भी ठण्ड के मारे दुबकना पड़ा |

अब काफी वक्त तक माहोल शांत हो गया, सभी ठण्ड के मारे दुबके हुए थे, तभी एक और बंदर का जमीर जागा और वो केलों के गुच्छो की और भडा ही था की बाकी के चार(4) बंदर उसपर टूट पड़ें, उसे अपनी पूरी ताकत लगा कर मारा, पिटा, धोया | और इतना मार खा कर वो बंदर पीछे हट गया, अब वहां का हाल थोडा गंभीर हो चला था, जो भी थोड़ी हिम्मत दिखाता और उन केलों के गुच्छो की और भड़ता उसे वहीँ बुरी तरहा पीट दिया जाता |

अब बारी की अगले पड़ाव की, वैज्ञानिको ने एक नया बंदर उस पिंजरे में डाला और एक पुराना बंदर बाहर निकाल लिया, नया बंदर वहां के नियमो से वंचित था | उसने वही किया जो वाजिब था, वो तुरंत केलों की और दौड़ा मगर बाकी के बंदरो ने उसे धो डाला, बुरी तरहा पिट डाला और इतना सब झेलने के बाद वो बंदर एक कोने में दुबक गया | अब वज्ञानिको ने दूसरा नया बंदर पिंजरे में डाला और दूसरा पुराना बंदर बाहर निकाल लिया |


वही हुआ जो आप सोच रहे है, उसकी भी बुरी तरहा धुनाई हुई | मगर इस बार कुछ अलग था, और अलग ये था की जो चार(4) बंदर उसे पिट रहे थे, उनमे से एक बंदर वो भी था, जो दुसरे बंदर से पहले आया था और उसे खुद नहीं पता था की वो नए बंदर को क्यों पीट रहा है |

इसी तरहा वज्ञानिको ने धीरे-धीरे पांचो बंदरो को बदल दिया और वो नियम ज्यो का त्यों लागू रहा, जो भी बंदर केलों की और भड़ता बाकी के चार बंदर उसे पिट देते, और कमाल की बात ये की बाकियों को ये तक नहीं पता की वो क्यों पिट रहे है | यही है आज का समाज, आधारहीन समाज ! एक ऐसा समाज जो बिलकुल उन पांच बंदरो की भांति है, जो केवल दुसरो को देखे-देख बिना किसी आधार के, बिना सच्चाई तक पहुचे बस कार्य करते जा रहे है |

कहानी जरूर हास्यप्रद थी, मगर ये मामला गंभीर है, आज हर रोज़ समाज के कारण बहुत से लोगो की जिंदगी बर्बाद हो रही है, कही अपने खुद के बच्चे पर पढाई का जोर डाला जा रहा है, कही जात के नाम पर लोगो को काटा जा रहा है, वो ये तक नहीं जानते की वो ये क्यों कर रहे है सिवाए एक कारण के, की सभी यही कर रहे है, हमारे धर्म का काम यही है |

बात ये है की वो सोच नहीं रहे है, वो जागरूक नहीं है, उन्हें कुछ समझना नहीं है, वो केवल परंपरा अपनाना चाहते है, क्योकि उन्होंने यही देखा है यही सिखा है और धीरे-धीरे इतना बड़ा मजाक कर डाला है की एक आधारहीन समाज का निर्माण कर डाला, जो किसी इंसान को कुछ नहीं करने देता, "बस वही करो जो हम चाहते है", "उसी रस्ते पर चलो जिसके लिए हम कह रहे है" |

आज अगर आप एक सामान्य सा व्यवसाय कर रहे हों और अचानक आप अपने परिवार और मित्रो से जाकर कहेंगे की मुझे "पायलट" बनना है तो अधिकतर लोग यही कहेंगे की आप पागल हो चुके है, वो अपनी सारी ताकत आपको इस बात को समझाने में झोक देंगे की पायलट बनने में कितने जोखिम है, मगर कोई भी अपनी ताकत इसमें नहीं झोकेगा की पायलट बनने के लिए क्या करना होगा, कोन-कोन सी परिक्षाए देनी होंगी, पायलट का अभ्यास कोन सी संस्था करवाती है | कोई नहीं कहेगा, क्योकि सभी उस नए बंदर को पिट कर चुप करवा देना चाहते है, क्योकि असल बात तो यही है की उन्हें खुद नहीं पता की पायलट कैसे बना जाता है |

Friday, 17 March 2017

मुश्किलों का असर | Impact of difficulties

mushkilo ka asar
मुश्किलों का असर |  Impact of difficulties


बात प्रमाण की है, तो आज एक प्रमाण की बात होगी | एक बार तीन चीज़े चुनी गई, पहली चीज़ आलू, दूसरी चीज़ अंडा और तीसरी चीज़ कॉफ़ी के बीज | इन तीनो का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं मगर क्या फर्क पड़ता है ?

इसी के साथ तीन समान आकार के बर्तन लिए गए जिनमे पानी भरा गया | पानी भरने के पश्चात् आलू,अंडा और कॉफ़ी के बीजों को तीनो बर्तनों में अलग-अगल रख दिया गया, और तीनो बर्तनों को गर्म होने के लिए आग पर रख दिया गया | वाजिब सी बात थी की पानी उबलने लगा और इन तीनो चीजों को लगातार उसी तापमान पर उबाला गया | कुछ समय उबालने के बाद इन्हें आग पर से उतार लिया गया और ठंडा किया गया |

ठंडा करने के बाद जब आलू का निरक्षण हुआ तो वो उतना ठोस नहीं था, वो आसानी से हाथो से दबाया जा सकता है, वो कमजोर हो चूका था | वही दूसरी और जब अंडे को देखा गया तो वो पत्थर की भाती कठोर हो चला था, जबकि पहले वो आसानी से तोडा जा सकता था, अर्थात वो ताकतवर हो गया था | मगर अब कॉफ़ी के बीजों को जाचनें की बारी थी परन्तु जैसे ही कॉफ़ी के बीजों को जांचा गया तो उनमे एक अलग ही महक थी और एक अलग ही स्वाद था, जो बेहद ही दुर्लभ है |


बिलकुल यही चीज़े लोगो के साथ भी होती है, कुछ लोग सफल होते है, कुछ लोग हारे हुए और कुछ लोग खुद को इतना कट्टर बना लेते है की उनकी तानाशाही ही उनके अंत का कारण बनती है | जैसे इन तीन चीजों के सामने समान तापमान पर उबलता पानी था उसी तरह सभी के सामने वही समान मुश्किलें होती है, मगर कुछ लोगो पर मुश्किलों का असर ऐसा होता है की वो आलू की भाति कमजोर हो जाते है तो कुछ गुस्से से भरपूर अपने मन में नफ़रत लिए अंडे की भाती कठोर, मगर कुछ लोगों पर मुश्किलों का असर इस भांति होता है की वो उन्हें ही अपनी ताकत बनाते है, उनसे सीखते है, बार-बार गिरते है और फिर उठ चलते है पर कभी रुकते नहीं |

मुश्किल को अगर गहराई से समझा जाए तो वो कहने को तो केवल एक नाम है, असल में तो वो एक अध्याय है, एक जरिया है, एक रास्ता है, एक शिक्षक है जो हमें सफलता से भी ज्यादा, बहुत ज्यादा सिखाती है | और आप जितना ज्यादा सीखते है उतना ही सफलता के करीब होते चले जाते है |

Wednesday, 15 March 2017

जीवन का मोल | Life's worth

jivan ka mol
जीवन का मोल | Life's worth


महात्मा बुद्ध के पास एक व्यक्ति आया और पूछा कि मेरे जीवन का मोल क्या है ? ये बेहद ही गहरा सवाल था, ये व्यक्ति की विवशता व्यतीत कर रहा था, की वो अपने जीवन का मोल महात्मा बुद्ध से जानने के लिए कितना आतुर है, महात्मा बुद्ध मुस्कुराये और अपने पास रखे एक पत्थर को उठा कर दिया, और पूछा कि इस पत्थर का मोल तुम्हें क्या लगता है ?

व्यक्ति असमंजस में था, उसे समझ नहीं आ रहा था की वो एक पत्थर का मोल कैसे लगाए ? किन मायनो पर ? तभी महात्मा बुद्ध बोल उठे की 'जाओ और बाजार में इसका मूल्य पता करके आओ, मगर स्मरण रहे की इसे किसी को बेचना नहीं है'

व्यक्ति की जिज्ञासा अब बढ़ चुकी थी, क्योकि उसके विचारो में अब कुछ नए प्रश्नों ने जन्म लिया था, मगर उन्ही के साथ वो बाज़ार की और भड चला | बाज़ार में उसे सबसे पहले एक फलों की दुकान मिली, जहाँ बहुत सारे संतरे रखे हुए थे, व्यक्ति ने दुकानदार को पत्थर दिखाते हुए कहा की 'मित्र इस पत्थर के बदले में तुम मुझे क्या दे सकते हों?'

दुकानदार ने पत्थर को अच्छे से देखा, उसे तराजू में तोला और कहा की 'इसके बदले में, मैं तुम्हे पंद्रह(15) संतरे दे सकता हूँ'

व्यक्ति ने पत्थर वापस लिया और आगे भड गया, क्योकि उसे पत्थर बेचना नहीं था, वो केवल उसका मोल पता लगाना चाहता था | चलते-चलते वो एक सब्जी की दुकान पर पंहुचा और वही प्रश्न पूछ बेठा की 'मित्र इस पत्थर के बदले में तुम मुझे क्या दे सकते हों?'


सब्जी वाले ने पत्थर को देखा, जाना, समझा और कहा की 'इसके बदले में, मैं तुम्हे एक बोरी आलू दे सकता हूँ'

शायद व्यक्ति को कुछ समझ आने लगा था, मगर अब भी कही न कहीं कुछ स्पष्ट नहीं था, वो और आगे भडा और एक सुनार की दुकान में जा पंहुचा | वहां भी उसने वही सवाल किया की 'सुनार, तुम इस पत्थर के बदले में मुझे क्या दे सकते हों?'

सुनार परखी था, वो तुरंत बोल बेठा की 'मैं इसके बदले में तुमने एक लाख रुपये दे सकता हूँ'

व्यक्ति अब चकित था, मगर महात्मा बुद्ध के कहे अनुसार वो पत्थर को बिना बेचे वापस लेकर आगे भड़ने लगा, सुनार ने फिर आवाज़ लगाई 'मित्र, मैं तुमने इसके बदले में बीस(20) लाख रूपये दे सकता हूँ', व्यक्ति को अचम्भा तो हो रहा था, मगर उसने अपने कदम आगे भडा दिए और सुनार को मनाही का इशारा करते हुए वहां से चला गया |

आगे उसे एक जोहरी की दुकान दिखाई दी, जो हीरो की कारीगरी किया करता था, वो बाज़ार की सबसे भव्य और शानदार दुकान थी | व्यक्ति दुकान के भीतर गया और जोहरी से उसने वही समान सवाल पूछा 'जोहरी, तुम इस पत्थर के बदले में मुझे क्या दे सकते हों?'


जोहरी ज्ञानी था, उसे कई सालो का तजुरबा था, वो देखते ही समझ गया की पत्थर की कीमत बहुत ही ज्यादा है, जोहरी ने पत्थर को बड़ी सतर्कता से उठाया और एक लाल कपडा बिछा कर उस पर रख दिया, उसने अपने उपकरणों का उपयोग कर उस पत्थर पर अलग-अलग तरहा की रौशनी डाली और उस व्यक्ति को पत्थर की रौशनी द्वारा बदलती खूबसूरती दिखाई | जोहरी ने व्यक्ति से कहा की इस पत्थर की कीमत इतनी ज्यादा है की 'मैं अपना सारा धन,घर-बार,सम्पति यहाँ तक की ये पूरा शहर भी बेच दूँ, तो भी मैं ये पत्थर नहीं खरीद सकता'

व्यक्ति चोंक उठा और तुरंत वो पत्थर लेकर वापस महात्मा बुद्ध की और दोड़ पड़ा, वो जैसे ही महात्मा बुद्ध के पास पंहुचा, महात्मा बुद्ध ने प्रश्न किया 'क्या हुआ ? मोल ज्ञात हुआ ?'

व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध के चरण पकड़ लिए और कहा 'हाँ, मोल ज्ञात हो गया, मुझे जीवन का मोल ज्ञात हो गया है प्रभु' |

महात्मा बुद्ध ने व्यक्ति की दोनों बाजू पकड़ कर उसे सहजता से उपर उठाया और कहा की 'हर व्यक्ति कीमती है, मगर उसकी कीमत सामने वाला अपनी समझ और अपनी औकात के हिसाब से लगाता है' |