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Tuesday, 27 June 2017

सब कुछ तुम्हारे हाथ में है | Everything is in your hand

sab kuch tumhaare haath me hai
सब कुछ तुम्हारे हाथ में है | Everything is in your hand

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु के अनुभव को चुनोती देने की सोची, वो गुरु को परखना चाहता था | वो उन्हें चकमा देना चाहता था, उनका हास्य बनाना चाहता था |

कुछ दिनों बाद उसे एक तरकीब सूझी, एक ऐसी तरकीब जो एक दम सटीक थी, रामबाण की तरहा, जो गुरु को हरा सकती है|

शिष्य सवेरे-सवेरे बगीचे में तितली पकड़ने गया, कई घंटो की मशकत के बाद केसे-तैसे उसने एक तितली पकड़ी | तितली पकड़ने के साथ ही शिष्य का पहला चरण पूरा हो चूका था और अब उसे इंतज़ार था, दुसरे चरण का |

गुरु जी अपनी कक्षा दोपहर दो बजे बिठाते थे, जहाँ करीबन तीन सों बच्चे पढने आते थे | वहां ढेरो बातें होती थी, विज्ञान से लेकर, आत्म ज्ञान तक | मगर आज गुरु जी नहीं जानते थे, की उनके साथ क्या होने वाला है |

गुरु जी के आते ही शिष्य ने गुरु जी से पूछा, "गुरु जी, क्या आप मेरे एक प्रश्न का जवाब दे सकते है ?" | गुरु जी ने कहा "हाँ बालक, कहो" | शिष्य ने अपने दोनों हाथो के बीच तितली छुपा रखी थी, उसने दोनों हाथ गुरु जी के सामने किये|

और कहा "गुरु जी मेरे हाथो में एक तितली है, आपको बताना है की वो जिन्दा है या मर गई ?" गुरु जी ये सुन कर हैरान हो गए की ये केसा प्रश्न है, मगर अब जब बालक ने सभी के सामने पूछा है, तो जवाब तो देना ही होगा |

गुरु असमंजस में पड़ गए, वो जान गए थे की शिष्य मेरी परीक्षा ले रहा है | उन्हें पता था की अगर मैं कहूँगा की तितली जिन्दा है, तो वो उसे वही मसल कर मार देगा और मुझे गलत साबित करने की कोशिश करेगा | और वहीँ अगर मैं कहूँगा की तितली मर गई है तो वो उसे जिन्दा दिखा कर मेरा हास्य बनाने की कोशिश करेगा |

मगर गुरु समझदार था, ज्ञानी था | उसने इतना खुबसूरत जवाब दिया की शिष्य सुन कर स्तब्ध रह गया | गुरु ने कहा की "बेटा, सब कुछ तुम्हारे हाथ में है" |

Friday, 31 March 2017

पागल कौन है | Who is mad

pagal kon hai
पागल कौन है | Who is mad

एक बार एक राजा था, उसका भरा-पूरा राज्य था | सारी प्रजा उसके राज में खुश-हाल थी, राजा किसी को कभी कोई समस्या नहीं आने देता था | मगर राज्य में दो कुएं थे, एक कुआ वो, जिसमे से प्रजा पानी ले जाती थी और दूसरा कुआ वो, जिसमे से राजा के लिए पानी ले जाया जाता था |

एक बार एक वैध उस राज्य से होकर गुजर रहा था, उसके पास उसकी जड़ी-बूटियों का झोला भी था | रात के अँधेरे में अचानक वो उस कुए से टकराया, जिससे प्रजा पानी ले जाया करती थी और वहां टकराते ही उसका जड़ी-बूटियों का झोला उसी कुए में गिर गया | अँधेरा होने के कारण वो कुए में देख नहीं पाया और चंद प्रयत्न करने के बाद हार कर अपने रस्ते की और चल दिया |


मगर अब कुछ ऐसा होने वाला था, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था | रात भर जड़ी-बूटियों का कुछ ऐसा मिश्रण बना जिसने पानी को एक प्रकार का रासायनिक द्रव्य बना दिया | सुबह वो पानी पूरी प्रजा तक पहुँच गया और सभी ने उसका सेवन किया |


कुछ वक्त बाद धीरे-धीरे प्रजा के सभी लोग पागल होने लगे, सिवाए राजा के | स्मरण रहे सिवाए राजा के | अब प्रजा के सभी लोग पागलों जैसा व्यवहार करने लगे थे पर राजा सामान्य था | प्रजा के सभी लोग स्वयं पागल थे और असामान्य गतिविधियाँ करते थे और जब भी राजा प्रजा के बीच कोई सामान्य कार्य करता तो पूरी प्रजा राजा को पागल समझती थी |

ध्यान से पढ़िए की पूरी प्रजा राजा को पागल समझती थी जबकि पागल वो स्वयं थे |

अब बात की गंभीरता पर चलते है, की वहां असल में पागल कौन था, प्रजा या राजा ? दोनों पक्ष एक दुसरे को पागल समझ रहे थे, क्या सच में राजा पागल था या प्रजा पागल थी ?


प्रजा की और से देखें तो राजा और राजा की और से देखे तो प्रजा | असल में ये केवल विचारो का फर्क है, आजतक आपने जो भी सभी लोगो को करते देखा है, वो आपके दिमाग में एक विचार बन गया है, और अब अगर आप अचानक किसी ऐसे व्यक्ति,समुदाय या फिर समाधान को देखते है जो आपने आजतक नहीं देखा तो आप उसे पागल कहते है | असल में पागल शब्द को अच्छे से समझा जाये तो अर्थ है की मैं तुम्हारी गतिविधियों, विचारों और काम करने के तरीकों को नहीं समझ पाया हूँ |


पढ़ा-लिखा व्यक्ति किसी अनपढ़ को पागल कहता है, तो अनपढ़ पढ़े-लिखे व्यक्ति को | असल में दोनों केवल आरोप लगा रहे है, मगर दोनों में से कोई एक दुसरे को समझने की कोशिश नहीं कर रहा | अगर दोनों एक दुसरे को समझने की कोशिश करे तो वो जान जायेंगे की पागल कोई नहीं था, असल में वो केवल उनके विचारो में था, जिसका कभी कोई अस्तित्व ही नहीं है |

Friday, 17 March 2017

मुश्किलों का असर | Impact of difficulties

mushkilo ka asar
मुश्किलों का असर |  Impact of difficulties


बात प्रमाण की है, तो आज एक प्रमाण की बात होगी | एक बार तीन चीज़े चुनी गई, पहली चीज़ आलू, दूसरी चीज़ अंडा और तीसरी चीज़ कॉफ़ी के बीज | इन तीनो का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं मगर क्या फर्क पड़ता है ?

इसी के साथ तीन समान आकार के बर्तन लिए गए जिनमे पानी भरा गया | पानी भरने के पश्चात् आलू,अंडा और कॉफ़ी के बीजों को तीनो बर्तनों में अलग-अगल रख दिया गया, और तीनो बर्तनों को गर्म होने के लिए आग पर रख दिया गया | वाजिब सी बात थी की पानी उबलने लगा और इन तीनो चीजों को लगातार उसी तापमान पर उबाला गया | कुछ समय उबालने के बाद इन्हें आग पर से उतार लिया गया और ठंडा किया गया |

ठंडा करने के बाद जब आलू का निरक्षण हुआ तो वो उतना ठोस नहीं था, वो आसानी से हाथो से दबाया जा सकता है, वो कमजोर हो चूका था | वही दूसरी और जब अंडे को देखा गया तो वो पत्थर की भाती कठोर हो चला था, जबकि पहले वो आसानी से तोडा जा सकता था, अर्थात वो ताकतवर हो गया था | मगर अब कॉफ़ी के बीजों को जाचनें की बारी थी परन्तु जैसे ही कॉफ़ी के बीजों को जांचा गया तो उनमे एक अलग ही महक थी और एक अलग ही स्वाद था, जो बेहद ही दुर्लभ है |


बिलकुल यही चीज़े लोगो के साथ भी होती है, कुछ लोग सफल होते है, कुछ लोग हारे हुए और कुछ लोग खुद को इतना कट्टर बना लेते है की उनकी तानाशाही ही उनके अंत का कारण बनती है | जैसे इन तीन चीजों के सामने समान तापमान पर उबलता पानी था उसी तरह सभी के सामने वही समान मुश्किलें होती है, मगर कुछ लोगो पर मुश्किलों का असर ऐसा होता है की वो आलू की भाति कमजोर हो जाते है तो कुछ गुस्से से भरपूर अपने मन में नफ़रत लिए अंडे की भाती कठोर, मगर कुछ लोगों पर मुश्किलों का असर इस भांति होता है की वो उन्हें ही अपनी ताकत बनाते है, उनसे सीखते है, बार-बार गिरते है और फिर उठ चलते है पर कभी रुकते नहीं |

मुश्किल को अगर गहराई से समझा जाए तो वो कहने को तो केवल एक नाम है, असल में तो वो एक अध्याय है, एक जरिया है, एक रास्ता है, एक शिक्षक है जो हमें सफलता से भी ज्यादा, बहुत ज्यादा सिखाती है | और आप जितना ज्यादा सीखते है उतना ही सफलता के करीब होते चले जाते है |

Wednesday, 15 March 2017

जीवन का मोल | Life's worth

jivan ka mol
जीवन का मोल | Life's worth


महात्मा बुद्ध के पास एक व्यक्ति आया और पूछा कि मेरे जीवन का मोल क्या है ? ये बेहद ही गहरा सवाल था, ये व्यक्ति की विवशता व्यतीत कर रहा था, की वो अपने जीवन का मोल महात्मा बुद्ध से जानने के लिए कितना आतुर है, महात्मा बुद्ध मुस्कुराये और अपने पास रखे एक पत्थर को उठा कर दिया, और पूछा कि इस पत्थर का मोल तुम्हें क्या लगता है ?

व्यक्ति असमंजस में था, उसे समझ नहीं आ रहा था की वो एक पत्थर का मोल कैसे लगाए ? किन मायनो पर ? तभी महात्मा बुद्ध बोल उठे की 'जाओ और बाजार में इसका मूल्य पता करके आओ, मगर स्मरण रहे की इसे किसी को बेचना नहीं है'

व्यक्ति की जिज्ञासा अब बढ़ चुकी थी, क्योकि उसके विचारो में अब कुछ नए प्रश्नों ने जन्म लिया था, मगर उन्ही के साथ वो बाज़ार की और भड चला | बाज़ार में उसे सबसे पहले एक फलों की दुकान मिली, जहाँ बहुत सारे संतरे रखे हुए थे, व्यक्ति ने दुकानदार को पत्थर दिखाते हुए कहा की 'मित्र इस पत्थर के बदले में तुम मुझे क्या दे सकते हों?'

दुकानदार ने पत्थर को अच्छे से देखा, उसे तराजू में तोला और कहा की 'इसके बदले में, मैं तुम्हे पंद्रह(15) संतरे दे सकता हूँ'

व्यक्ति ने पत्थर वापस लिया और आगे भड गया, क्योकि उसे पत्थर बेचना नहीं था, वो केवल उसका मोल पता लगाना चाहता था | चलते-चलते वो एक सब्जी की दुकान पर पंहुचा और वही प्रश्न पूछ बेठा की 'मित्र इस पत्थर के बदले में तुम मुझे क्या दे सकते हों?'


सब्जी वाले ने पत्थर को देखा, जाना, समझा और कहा की 'इसके बदले में, मैं तुम्हे एक बोरी आलू दे सकता हूँ'

शायद व्यक्ति को कुछ समझ आने लगा था, मगर अब भी कही न कहीं कुछ स्पष्ट नहीं था, वो और आगे भडा और एक सुनार की दुकान में जा पंहुचा | वहां भी उसने वही सवाल किया की 'सुनार, तुम इस पत्थर के बदले में मुझे क्या दे सकते हों?'

सुनार परखी था, वो तुरंत बोल बेठा की 'मैं इसके बदले में तुमने एक लाख रुपये दे सकता हूँ'

व्यक्ति अब चकित था, मगर महात्मा बुद्ध के कहे अनुसार वो पत्थर को बिना बेचे वापस लेकर आगे भड़ने लगा, सुनार ने फिर आवाज़ लगाई 'मित्र, मैं तुमने इसके बदले में बीस(20) लाख रूपये दे सकता हूँ', व्यक्ति को अचम्भा तो हो रहा था, मगर उसने अपने कदम आगे भडा दिए और सुनार को मनाही का इशारा करते हुए वहां से चला गया |

आगे उसे एक जोहरी की दुकान दिखाई दी, जो हीरो की कारीगरी किया करता था, वो बाज़ार की सबसे भव्य और शानदार दुकान थी | व्यक्ति दुकान के भीतर गया और जोहरी से उसने वही समान सवाल पूछा 'जोहरी, तुम इस पत्थर के बदले में मुझे क्या दे सकते हों?'


जोहरी ज्ञानी था, उसे कई सालो का तजुरबा था, वो देखते ही समझ गया की पत्थर की कीमत बहुत ही ज्यादा है, जोहरी ने पत्थर को बड़ी सतर्कता से उठाया और एक लाल कपडा बिछा कर उस पर रख दिया, उसने अपने उपकरणों का उपयोग कर उस पत्थर पर अलग-अलग तरहा की रौशनी डाली और उस व्यक्ति को पत्थर की रौशनी द्वारा बदलती खूबसूरती दिखाई | जोहरी ने व्यक्ति से कहा की इस पत्थर की कीमत इतनी ज्यादा है की 'मैं अपना सारा धन,घर-बार,सम्पति यहाँ तक की ये पूरा शहर भी बेच दूँ, तो भी मैं ये पत्थर नहीं खरीद सकता'

व्यक्ति चोंक उठा और तुरंत वो पत्थर लेकर वापस महात्मा बुद्ध की और दोड़ पड़ा, वो जैसे ही महात्मा बुद्ध के पास पंहुचा, महात्मा बुद्ध ने प्रश्न किया 'क्या हुआ ? मोल ज्ञात हुआ ?'

व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध के चरण पकड़ लिए और कहा 'हाँ, मोल ज्ञात हो गया, मुझे जीवन का मोल ज्ञात हो गया है प्रभु' |

महात्मा बुद्ध ने व्यक्ति की दोनों बाजू पकड़ कर उसे सहजता से उपर उठाया और कहा की 'हर व्यक्ति कीमती है, मगर उसकी कीमत सामने वाला अपनी समझ और अपनी औकात के हिसाब से लगाता है' |